दिल्ली हाईकोर्ट ने वैवाहिक कानून में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है जो भारतीय पारिवारिक न्यायशास्त्र में नई दिशा दे सकता है। न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने 19 सितंबर 2025 को दिए अपने निर्णय में स्पष्ट किया है कि शारीरिक संबंध से इनकार, बच्चे को पिता से दूर करना और प्रतिशोधात्मक केस दाखिल करना संयुक्त रूप से वैवाहिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
न्यायालय की व्यापक परिभाषा
अदालत ने मानसिक क्रूरता की परिभाषा को विस्तार देते हुए कहा है कि पति या पत्नी द्वारा लंबे समय तक और अनुचित रूप से शारीरिक अंतरंगता से इनकार करना, बच्चे को जानबूझकर दूसरे माता-पिता से दूर करना, और तलाक की कार्यवाही शुरू होने के बाद “जवाबी कार्रवाई” के रूप में कई आपराधिक शिकायतें दर्ज करना ये सभी संयुक्त रूप से हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत मानसिक क्रूरता माने जाएंगे।
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वैवाहिक संबंधों की आधारशिला
न्यायालय ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया है कि “यह सर्वविदित है कि यौन संबंध और वैवाहिक कर्तव्यों का निर्वहन शादी का आधार है। उनके लिए लगातार इनकार करना न केवल वैवाहिक जीवन के बिखराव को दर्शाता है, बल्कि क्रूरता का भी प्रतीक है”। अदालत ने कहा कि सहवास और वैवाहिक कर्तव्यों का निर्वहन विवाह की आधारशिला है और इनसे लगातार वंचित रखना न केवल संघ के अपूरणीय टूटने को दर्शाता है बल्कि न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करने वाली क्रूरता भी है।
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बच्चे को हथियार बनाने की निंदा
हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में नाबालिग बच्चे को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कड़ी निंदा की है। न्यायालय ने कहा कि “बच्चे को हथियार बनाना न केवल दूसरे माता-पिता को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि बच्चे के भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डालता है और इससे पारिवारिक सद्भाव की नींव कमजोर होती है”। अदालत ने माना कि नाबालिग बच्चे को जानबूझकर दूसरे माता-पिता से अलग करना मनोवैज्ञानिक क्रूरता का गंभीर रूप है।
प्रतिशोधात्मक कानूनी कार्रवाई
न्यायालय ने प्रतिशोधात्मक कानूनी कार्रवाई के मुद्दे पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। इस मामले में पत्नी ने तलाक याचिका दायर होने के बाद 2010, 2011 और 2015 में पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत तीन अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज कराईं थीं। अदालत ने कहा कि तलाक की कार्यवाही के बाद दर्ज की गई शिकायतों के समय को उनकी विश्वसनीयता और संदर्भ का मूल्यांकन करते समय नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पारिवारिक एकजुटता का महत्व
न्यायालय ने पारिवारिक संबंधों की महत्ता पर भी ध्यान दिया है। अदालत ने कहा कि “मात्र अलग रहने की इच्छा क्रूरता नहीं है, लेकिन प्रतिवादी पर अपने परिवार के साथ संबंध तोड़ने के लिए लगातार दबाव डालना निश्चित रूप से क्रूरता है”। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पत्नी द्वारा पति को उसके माता-पिता से अलग करने का लगातार प्रयास करना मानसिक क्रूरता है।
मामले की पृष्ठभूमि
इस निर्णय का आधार एक ऐसे मामले में था जहां दोनों पक्षों का विवाह 3 मार्च 1990 को हुआ था और उनका एक बेटा था जिसका जन्म 3 अक्टूबर 1997 को हुआ था। नवंबर 2009 में पति ने पत्नी द्वारा लगातार क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक के लिए याचिका दायर की थी। पत्नी ने 2008 से पति के साथ रहने से इनकार कर दिया था और अदालत ने पाया कि उसने वैवाहिक संबंधों से पूरी तरह से खुद को अलग कर लिया था।
न्यायिक मिसाल
यह फैसला भारतीय वैवाहिक कानून में एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “विवाह के लिए सेक्स के बिना अभिशाप है” और “यौन संबंधों में निराशा से ज्यादा विवाह के लिए कुछ भी घातक नहीं है”। अदालत ने समर घोष बनाम जया घोष (2007) और विद्या विश्वनाथन बनाम कार्तिक बालकृष्णन (2015) जैसे महत्वपूर्ण मामलों का संदर्भ दिया।
समाज पर प्रभाव
यह निर्णय भारतीय समाज में बढ़ते वैवाहिक विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि वैवाहिक जीवन में केवल शारीरिक हिंसा ही क्रूरता नहीं है, बल्कि मानसिक और भावनात्मक प्रताड़ना भी उतनी ही गंभीर है। यह फैसला उन लोगों के लिए राहत की बात है जो वैवाहिक जीवन में मानसिक क्रूरता झेल रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला वैवाहिक कानून में एक नई दिशा प्रदान करता है और उन मामलों में स्पष्टता लाता है जहां पारंपरिक क्रूरता की परिभाषा अपर्याप्त थी। यह निर्णय विशेष रूप से उन स्थितियों में महत्वपूर्ण है जहां एक पक्ष दूसरे को परिवार से अलग करने का दबाव डालता है या वैवाहिक अधिकारों से वंचित रखता है।



