इस घटना के बाद छात्रों और शिक्षकों में भी नाराजगी देखी जा रही है। कई छात्रों ने कहा कि ऐसे सवाल न केवल स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान हैं, बल्कि युवाओं के मन में भी ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर भ्रम पैदा करते हैं। शिक्षकों का मानना है कि प्रश्न पत्र तैयार करते समय अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए और ऐतिहासिक तथ्यों की सही व्याख्या होनी चाहिए। समाज के विभिन्न वर्गों ने भी इस घटना की निंदा की है और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग की है।
Bengal university- राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल
यह विवाद केवल शिक्षा जगत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी इसकी गूंज सुनाई दी। विपक्षी दलों ने राज्य सरकार पर शिक्षा के क्षेत्र में लापरवाही का आरोप लगाया। वहीं, कई सामाजिक संगठनों ने स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान की रक्षा के लिए सख्त कदम उठाने की मांग की है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है और लोग विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब मांग रहे हैं।
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यूनिवर्सिटी का इतिहास और भूमिका
विद्यासागर यूनिवर्सिटी पश्चिम बंगाल की प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों में से एक है, जिसके अधीन राज्य के 40 से अधिक महाविद्यालय संचालित होते हैं। इस यूनिवर्सिटी का नाम समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऐसे में यहां इस तरह की गलती होना और भी गंभीर माना जा रहा है।
भविष्य के लिए शिक्षा व्यवस्था में सतर्कता की जरूरत
इस विवाद के बाद शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि प्रश्न पत्र निर्माण की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए। ऐतिहासिक तथ्यों की प्रस्तुति में संवेदनशीलता और सटीकता बेहद जरूरी है, ताकि छात्रों को सही जानकारी मिल सके और देश के नायकों का सम्मान बना रहे। विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी भरोसा दिलाया है कि आगे से ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे।