कोर्ट ने यह नोट किया कि जिला न्यायाधीश जब हाई कोर्ट के जजों से मिलते हैं, तो व्यवहार और बॉडी लैंग्वेज में सम्मान की कमी साफ झलकती है। यह समस्या केवल औपचारिक संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि यह मानसिकता की गहरी जड़ को दर्शाती है।
“सेरफ और फ्यूडल लॉर्ड” की तुलना
अदालत ने जिला जजों को “सेरफ” और हाई कोर्ट के जजों को “फ्यूडल लॉर्ड” बताते हुए स्पष्ट किया कि जिला जजों में डर और दबाव की भावना व्याप्त है, जिससे उन्हें अपनी आज़ादी पूरी तरह से नहीं मिल पाती। कई बार वे हाई कोर्ट जजों के स्वागत में बाकायदा प्लेटफॉर्म पर खड़े होते हैं और उनकी अनुमति बिना बैठने से भी हिचकते हैं।
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मनोवैज्ञानिक दबाव का न्यायिक कार्य पर असर
यह डर जिला जजों के आत्मविश्वास को कम करता है और उनके फैसलों में निष्पक्षता को प्रभावित करता है। अदालत ने माना कि बार-बार की आलोचना और जवाबदेही के कारण जिला न्यायाधीश स्वतंत्र निर्णय लेने में हिचकते हैं।
सामाजिक और जातिगत सोच की परतें
हाई कोर्ट ने न्यायपालिका में जातिगत और सामंती सोच की बजाय स्पष्ट निष्पक्षता की आवश्यकता पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि राज्य में उच्च न्यायपालिका को “सवर्ण” और जिला जजों को “शूद्र” की तरह देखा जाता है, जो न्यायिक सम्मान के लिए बाधक है।
व्यक्तिगत जीवन और नौकरी की स्थिरता की चिंता
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि जिला जज अपनी नौकरी की सुरक्षा, परिवार की देखभाल और सामाजिक प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित रहते हैं। नौकरी से निकाले जाने या पेंशन छूटने का डर लगातार उनके मनोबल को कम करता है।
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न्याय प्रक्रिया पर इसका सीधा असर
डर के माहौल में काम करने वाले अधिकारी अक्सर निष्पक्ष निर्णय देने से हिचकते हैं। इसका प्रभाव न्याय की गुणवत्ता पर पड़ता है और न्याय व्यवस्था में खामियां उभरती हैं।
खास मामले में उच्च न्यायालय का रवैया
यह टिप्पणी एक ऐसे विशेष मामले में आई, जिसमें एक निष्कलंक विशेष जज की सेवा समाप्त कर दी गई थी। बिना भ्रष्टाचार के ठोस प्रमाण के केवल पुलिस अधिकारियों के बयान पर यह कदम उठाए जाने को हाई कोर्ट ने ‘मोटा अन्याय’ बताया और राज्य सरकार को जुर्माना भी लगाया।