मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अहम सुनवाई में मेडिकल बोर्ड और डॉक्टरों को लेकर सख्त अवलोकन किया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि गर्भावस्था की समाप्ति (Termination of Pregnancy) जैसे गंभीर विषय पर राय देते समय बोर्ड को पूरी तरह सावधानी और जिम्मेदारी बरतनी होगी। न्यायालय ने चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में लापरवाही या सतही दृष्टिकोण न केवल महिला के जीवन को प्रभावित करता है बल्कि कानूनी प्रक्रिया पर भी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
मामला कैसे पहुंचा अदालत तक
जानकारी के अनुसार, हाईकोर्ट की यह टिप्पणी उस याचिका पर आई जिसमें एक महिला ने गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति मांगी थी। मामला मेडिकल बोर्ड के समक्ष भेजा गया था ताकि गर्भावस्था की स्थिति और महिला के स्वास्थ्य के संबंध में उचित राय दी जा सके। लेकिन बोर्ड ने जो रिपोर्ट प्रस्तुत की उसकी भाषा और तर्कों पर न्यायालय ने असंतोष जाहिर किया। अदालत ने कहा कि मेडिकल निष्कर्ष स्पष्ट, वैज्ञानिक और मानवता को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किए जाने चाहिए।
मंदसौर में गरबे की प्रैक्टिस कर रही युवती को बीच मैदान से किडनैप
जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा मामला
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि गर्भावस्था की समाप्ति से जुड़े केस केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं बल्कि महिला के जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा से भी जुड़े हैं। ऐसे मामलों में डॉक्टरों को एक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अदालत ने कहा कि मेडिकल बोर्ड को अपनी रिपोर्ट तैयार करते समय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसमें चिकित्सा विज्ञान के मानकों और महिला की मानसिक और शारीरिक परिस्थिति, दोनों का पूरा विवरण हो।
22% डिस्काउंट के साथ, Nothing 3a अब सस्ते दामों में, देखें फीचर्स.
मेडिकल बोर्ड की जिम्मेदारी
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मेडिकल बोर्ड केवल औपचारिकता निभाने के लिए न बैठें। उनकी राय कानून की नींव बनती है, इसलिए कोई भी ढिलाई सीधे न्याय और महिला की गरिमा पर असर डालती है। अदालत ने यह भी जोड़ा कि डॉक्टरों को स्पष्ट, ठोस और विस्तारपूर्ण कारण बताने चाहिए कि गर्भावस्था को समाप्त करना महिला के स्वास्थ्य के लिए क्यों आवश्यक है या क्यों मना किया जा रहा है।
अदालत का सामाजिक संदेश
हाईकोर्ट ने अपने अवलोकन में यह भी इंगित किया कि महिलाओं को प्रजनन अधिकार और शरीर पर स्वामित्व का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। ऐसे में मेडिकल बोर्ड को यह समझना चाहिए कि उनकी राय महिला के अपने भविष्य और उसकी स्वतंत्रता से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती है। किसी भी ढुलमुल या अस्पष्ट रिपोर्ट से उसका अधिकार प्रभावित हो सकता है।
डॉक्टरों को मिली साफ हिदायत
सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि डॉक्टरों को यह भूलना नहीं चाहिए कि उनकी राय पर ही अदालत अंतिम निर्णय लेती है। यदि रिपोर्ट अधूरी या लापरवाह तरीके से बनाई गई तो इससे न केवल महिला को हानि होगी बल्कि न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता भी प्रभावित होगी। अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा कि आगे से किसी भी ऐसे मामले में मेडिकल बोर्ड को पूरे तथ्यों और विवेकपूर्ण विश्लेषण के आधार पर रिपोर्ट देनी होगी।
समाज में गूंजा असर
इस फैसले के बाद समाज में महिला अधिकारों और उनकी सुरक्षा पर चर्चा तेज हो गई है। कई महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अदालत की इस टिप्पणी का स्वागत किया। उनका कहना है कि यह आदेश उन महिलाओं के लिए सुरक्षा कवच साबित होगा जो असाधारण परिस्थितियों में गर्भ समाप्त करना चाहती हैं। वहीं चिकित्सा जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से डॉक्टरों में जिम्मेदारी और सतर्कता की भावना और मजबूत होगी।
डॉक्टरों की राय और कानूनी प्रक्रिया
विशेषज्ञों ने इस आदेश को एक सकारात्मक कदम बताया है। उनका कहना है कि अक्सर मेडिकल बोर्ड की राय को औपचारिक मानकर देखते हैं, लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उनकी टिप्पणियां महिला के जीवन, अधिकार और भविष्य को सीधे प्रभावित करती हैं। इसलिए राय देते समय डॉक्टरों को केवल मेडिकल रिपोर्ट तक सीमित न रहकर एक व्यापक सोच के साथ महिलाओं के हित में काम करना होगा।
लगातार बढ़ रहे मामले
पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामलों की संख्या लगातार बढ़ी है जिनमें महिलाएं विभिन्न परिस्थितियों के कारण गर्भ समाप्त करने की अनुमति के लिए अदालत की शरण ले रही हैं। इनमें से कई मामले सामाजिक, मानसिक और शारीरिक कारणों से जुड़े होते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि कोर्ट का यह सख्त रुख भविष्य में मेडिकल बोर्ड और डॉक्टरों को उनके कर्तव्यों का और बेहतर एहसास कराएगा।

