लिसा — एक नाम, जो आम लग सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपा है ऐसा दर्द, जिसे सुनकर कोई भी इंसान सिहर उठे। जब बाकी दुनिया स्कूल, कॉलेज, नौकरी और रिश्तों में आगे बढ़ रही थी, तब लिसा किसी अंधेरे कमरे में 20 सालों तक क़ैद रही।
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अंधेरे में बीते 20 साल
लिसा की ज़िंदगी एक साधारण लड़की की तरह शुरू हुई थी। लेकिन अचानक उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ने लगी और परिवार ने उसे “सुरक्षित” रखने के नाम पर घर के एक छोटे से कमरे में बंद कर दिया। खिड़की पर मोटी जाली, दरवाज़ा हमेशा बंद, और बाहर की दुनिया से पूरा रिश्ता खत्म। वहीं से शुरू हुई उसकी अंधेरे में जीने की मजबूरी।
दिन, महीने, और साल — सब एक जैसे लगते थे। कोई साथी नहीं, कोई बात करने वाला नहीं। बस कमरे की दीवारें थीं जो उसके दर्द की गवाह थीं।
आख़िर लोगों को कैसे पता चला?
पड़ोसियों को लंबे समय से उस घर से अजीब आवाजें सुनाई देती थीं। जब एक दिन किसी सामाजिक संस्था ने वहां छापा मारा, तो सबकी आंखें नम हो गईं। कमरे से निकली लिसा उस वक्त एक खोई हुई आत्मा जैसी लग रही थी — कमजोर, डरी हुई, और बोलने की कोशिश में भी असमर्थ।
संगठनों ने उसे अस्पताल पहुँचाया, जहाँ धीरे-धीरे उसे नया जीवन मिलने लगा।
समाज के लिए सीख
लिसा की कहानी सिर्फ एक लड़की की नहीं है, बल्कि हम सबके समाज की आईना है। मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) की अनदेखी, परिवार की सोच, और समाज की बेपरवाही — सबने मिलकर उसकी ज़िंदगी को 20 साल के अंधेरे में धकेल दिया।



