महाराष्ट्र के निवर्तमान बीजेपी प्रवक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता आरती अरुण साठे की बॉम्बे हाई कोर्ट न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति को लेकर राजनीति गरमाई हुई है। एनसीपी के विधायक और शरद पवार के निकटस्थ रोहित पवार ने इस नियुक्ति का कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने कहा है कि सत्तारूढ़ दल के पक्षधर व्यक्ति को न्यायाधीश बनाना लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा आघात है और इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर भारी सवाल उठते हैं।
http://Gold mining in Jabalpur- जबलपुर में मिला बड़ा खजाना, यहाँ जमीन में दबा है लाखों टन सोना!
सत्तारूढ़ दल की ओर से न्यायपालिका में प्रभाव डालने का आरोप
रोहित पवार ने सार्वजनिक मंच से सत्ताधारी पार्टी का पक्ष रखने वाले व्यक्ति की उच्च न्यायालय की कुर्सी पर नियुक्ति को भारतीय संविधान के न्यायपालिका में निष्पक्षता और सत्ता के पृथक्करण के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता बने व्यक्ति को सीधे न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है, तो क्या आम नागरिकों को निष्पक्ष न्याय मिलेगा? यह कदम न्यायपालिका को राजनीतिक रंग देने के समान है।
http://TCS employee- TCS ने 80% कर्मचारियों का वेतन बढा और 12000 कर्मचारियों को हटाया!
राजनीतिक पृष्ठभूमि और नियुक्ति विवाद के पक्ष और विपक्ष
आरती साठे ने फरवरी 2023 से जनवरी 2024 तक महाराष्ट्र बीजेपी की प्रवक्ता के पद पर कार्य किया था। बीजेपी का कथन है कि उन्होंने जनवरी 2024 में पार्टी के सभी पदों और सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके बावजूद विपक्षी दलों ने इस नियुक्ति को पूर्णतः राजनीति प्रभावित और न्यायपालिका की अखंडता के लिए खतरा बताया है। कांग्रेस और एनसीपी के साथ-साथ तृणमूल कांग्रेस ने भी इस नियुक्ति की निंदात्मक आलोचना की है और पुनर्विचार की मांग की है।
न्यायपालिका में नियुक्ति प्रक्रिया पर उठते सवाल
इस नियुक्ति की सिफारिश सुप्रीम कोर्ट के जजों के कॉलेजियम ने की थी, जो अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक विवाद का विषय बनी। विपक्ष ने इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर संदेह जताया है, खासकर तब जब न्यायपालिका का रुख राजनीतिक रूप से तटस्थ होना अनिवार्य है। रोहित पवार ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया से भी इस मामले में मार्गदर्शन प्राप्त करने की अपील की है।
राजनीतिक पार्टियों के बयानों का दोनों ओर से जवाब
बीजेपी नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताया है। उनका कहना है कि आरती साठे ने समय रहते अपनी पार्टी से इस्तीफा दिया था और उनकी नियुक्ति योग्यता के आधार पर हुई है, न कि राजनीतिक आधार पर। वहीं, विपक्षी दल यह मानते हैं कि यह नियुक्ति न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमज़ोर करेगी और लोकतांत्रिक संविधान के सिद्धांतों के विपरीत है।