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Retired Chief Justices in India- रिटायरमेंट के बाद “सरकारी पद नहीं लेंगे” CJI गवई, उनका प्लान जानिए!

भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई ने शनिवार को एक अहम घोषणा करते हुए बताया कि वे अपनी सेवा निवृत्ति के बाद किसी भी सरकारी पद को स्वीकार नहीं करेंगे। न्यायिक जगत में उनके इस फैसले को निष्पक्षता और नैतिक मूल्यों की बड़ी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि रिटायरमेंट के बाद उनका ध्यान सिर्फ परामर्श (काउंसल्टेंसी) और मध्यस्थता (मेडिएशन) जैसे कानूनी कार्यों पर रहेगा।

सीजेआई गवई का यह कदम भारतीय न्यायपालिका की पारदर्शिता और स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े पदों से रिटायर होने वाले न्यायाधीशों को सरकारी या अर्ध-सरकारी पदों पर नियुक्त किया जाता रहा है, जिससे अकसर निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाते थे। सीजेआई गवई ने इस परंपरा से अलग रहकर एक स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायाधीश के लिए संस्थानिक नैतिकता सर्वोपरि है।

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सरकारी पदों से दूरी, परामर्श और मध्यस्थता होगी प्राथमिकता

गवई ने साफ किया कि वह सेवानिवृत्ति के बाद केवल कानूनी मुद्दों पर सलाह देने और विवाद समाधान में मध्यस्थता करने जैसे निजी कार्य करेंगे। इससे वे न्यायिक प्रक्रिया में परोक्ष रूप से योगदान दे पाएंगे, लेकिन सत्ता या प्रशासनिक भागीदारी से दूर रहेंगे। इस फैसले की न्यायिक दायरे में सराहना भी हो रही है, क्योंकि इससे उनके अनुभव का बेहतर प्रयोग संभव होगा, साथ ही हितों के टकराव की कोई संभावना नहीं रहेगी।

न्यायिक कॅरियर की बेमिसाल यात्रा

सीजेआई बीआर गवई ने बतौर जज अपने करियर के दौरान कई महत्वूपर्ण फैसले दिए हैं और न्याय व्यवस्था में विविध सुधारों को प्रोत्साहित किया। उनकी कार्यशैली निष्पक्षता, संवेदनशीलता और संविधान के प्रति उच्च निष्ठा के लिए जानी जाती है। उनके फैसलों ने सामाजिक न्याय, मूल अधिकारों और प्रशासनिक सुधार जैसे विषयों पर कई बार निर्णायक भूमिका निभाई है।

अवकाश के बाद कानूनी क्षेत्र में सेवा का संकल्प

सेवानिवृत्ति के बाद भी न्याय के क्षेत्र में सक्रिय रहने की उनकी इच्छा से यह स्पष्ट है कि वे समाज एवं कानून के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बरकरार रखना चाहते हैं। परामर्श और मध्यस्थता उनके लिए न सिर्फ अनुभव साझा करने का माध्यम होगा, बल्कि युवाओं के लिए प्रेरणा भी बनेगा कि ईमानदार और निःस्वार्थ सेवा ही सर्वोच्च न्यायिक मूल्य है।

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देश में न्यायिक सेवा के बाद की भूमिका पर नई बहस

सीजेआई गवई के इस फैसले ने देशभर में न्यायिक सेवा के बाद रिटायर्ड जजों की भूमिका को लेकर फिर चर्चा छेड़ दी है। जहां एक ओर उनके इस रुख को नैतिक साहस का उदाहरण माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह भी उम्मीद जताई जा रही है कि न्यायपालिका से जुड़े अन्य वरिष्ठ लोग भी इसी राह पर चलें। इससे कानूनी और प्रशासनिक तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा मिलेगा।

युवा वकीलों और कानूनी पेशेवरों के लिए आदर्श

सीजेआई का साफ संदेश है कि न्यायिक सेवा का दायित्व न केवल कोर्टरूम तक सीमित है, बल्कि सेवा निवृत्ति के बाद भी समाज के लिए उचित मार्गदर्शन और संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। उनके कदम से युवा वकील और कानून के छात्र, दोनों ही सेवा, निष्पक्षता और कर्तव्यनिष्ठा की सच्ची भावना समझ सकते हैं।

न्यायिक समाज में बना रहेगा आदर्श

सीजेआई बी.आर. गवई का यह फैसला आने वाले वर्षों में न्यायिक समाज के लिए एक आदर्श के रूप में याद रखा जाएगा। यह उन तमाम न्यायिक अधिकारियों के लिए भी मार्गदर्शन है, जो जिम्मेदारियों के बाद भी पूरी तटस्थता के साथ समाज सेवा करना चाहते हैं। न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जनता के विश्वास को बनाए रखना ही उनका उद्देश्य रहेगा।

Tiwari Shivam

शिवम तिवारी को ब्लॉगिंग का चार वर्ष का अनुभव है कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में उन्होंने एक व्यापक समझ विकसित की है वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व दुनिया के नामी स्टार्टप्स के लिये भी काम करते हैं वह गैजेट्स ,ऑटोमोबाइल, टेक्नोलॉजी, स्पेस रिसर्च ,इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी ,कॉर्पोरेट सेक्टर तथा अन्य विषयों के लेखन में व्यापक योग्यता और अनुभव रखते हैं|

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