मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि मंदिरों में दान के रूप में प्राप्त धन केवल धार्मिक या मंदिर के रखरखाव कार्यों के लिए ही उपयोग किया जा सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि मंदिर के धन का उपयोग व्यावसायिक या वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता। हिंदू धार्मिक एवं चैरिटेबल एंडोमेंट्स एक्ट, 1959 के तहत मंदिर निधि का दान पूरी तरह से धार्मिक या परोपकारी उद्देश्य के लिए होता है, जोकि सार्वजनिक या सरकारी निधि नहीं है।
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सरकारी आदेश रद्द
मदुरै के मद्रास उच्च न्यायालय की पीठ ने पाँच सरकारी आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें मंदिरों के फंड का उपयोग विवाह हॉल बनाने के लिए अनुमति दी गई थी। उक्त आदेश 2023 से 2025 के बीच जारी किए गए थे। इन आदेशों में यह प्रस्ताव था कि मंदिर के परिसर या भूमि पर विवाह हॉल बनाए जाएंगे और उन्हें किराये पर दिया जाएगा। न्यायालय ने कहा कि विवाह एक धार्मिक आयोजन हो सकता है, परन्तु हॉल किराये पर देना व्यावसायिक प्रयास है, जो दान देने वाले भक्तों के विश्वास और मंदिर निधि के धार्मिक स्वभाव के विरुद्ध है।
मंदिर निधि का संरक्षण आवश्यक
न्यायालय का कहना है कि मंदिर के दान भक्तों की श्रद्धा का फल हैं, जो पूरी निष्ठा के साथ पूजा-पाठ और मंदिर के संरक्षण के लिए दिया जाता है। यह निधि मंदिर के रखरखाव, पूजा पद्धतियों के आयोजन, त्योहारों की व्यवस्था, गरीबों और जरूरतमंदों के भोजन व सहायता के लिए संगृहित की जाती है। इसलिए इस निधि को व्यावसायिक उद्यमों में लगाया जाना न तो उचित है और न ही वैध। कोर्ट ने सुझाव दिया कि मंदिर निधि को दान दाताओं की मंशा के अनुरूप ही खर्च किया जाना चाहिए, जो सेवा और भक्ति पर आधारित है।