मुंबई की विशेष एनआईए अदालत ने 2008 के मालेगांव बम ब्लास्ट मामले में आज ऐतिहासिक फैसला सुनाया। 17 वर्षों से चल रही लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर सहित सभी सातों आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। अदालत में फैसले के समय सभी आरोपियों की उपस्थिति अनिवार्य की गई थी।
गवाही और सबूतों की कमी बनी वजह
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि इस केस में अभियोजन पक्ष द्वारा उपयुक्त और ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं किए जा सके। पूरी सुनवाई के दौरान 323 गवाहों की गवाही दर्ज की गई, जिनमें से 34 गवाह अपने बयान से मुकर गए। अदालत ने कहा कि महज शंका के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, अपराध साबित करने के लिए प्रमाणिक साक्ष्य जरूरी हैं|
अदालत की अहम टिप्पणियाँ
विशेष न्यायाधीश एके लाहोटी ने अपने फैसले में कहा कि न तो घटना में प्रयुक्त मोटरसाइकिल के मालिकाना हक का ठोस सबूत मिला, न ही धमाके में इस्तेमाल हुए आरडीएक्स को ले जाने या बम असेंबल करने का कोई प्रमाणिक तथ्य अभियोजन पक्ष ने पेश किया। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अपराध स्थल पर साक्ष्य के संग्रह और मेडिकल प्रमाणपत्रों में भी गड़बड़ियाँ सामने आईं, जिससे जांच पर सवाल उठे|
अदालत का मानवीय आदेश
स्पेशल कोर्ट ने आदेश दिया कि विस्फोट में मारे गए प्रत्येक व्यक्ति के परिवार को दो लाख रुपये और घायल हर शख्स को पचास हजार रुपये का मुआवजा सरकार की ओर से दिया जाए। अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, और सिर्फ नैतिक सोच के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती|