मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) में पिछले छह वर्षों से ओबीसी आरक्षण को लेकर उच्च न्यायालय में याचिकाएं चली आ रही हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि राज्य सरकार द्वारा ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने से कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर चली जाएगी, जो कि सर्वोच्च न्यायालय की गाइडलाइन का उल्लंघन है। इस मुद्दे पर कई याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें आरक्षण की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।
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50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा का विवाद
सुप्रीम कोर्ट के पूर्वनिर्धारित निर्णय के अनुसार आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। एमपीपीएससी में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने की कार्रवाई से कुल आरक्षण 63 प्रतिशत तक पहुंच गया, जिसमें अनुसूचित जाति-जनजाति का भी आरक्षण शामिल है। यह बढ़ोतरी कई याचिकाओं का कारण बनी और मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने इस बढ़ोतरी पर रोक लगा दी। कोर्ट ने 14 प्रतिशत आरक्षण ही मानने को कहा जब तक कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में अंतिम फैसला न दे।http://Nitin Gadkari announces Highway- भोपाल से जबलपुर तक 255 किलोमीटर लंबा ग्रीनफील्ड हाईवे बनेगा जल्द|
न्यायालय की निर्देश और फैसले
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने सरकार को कठोर निर्देश दिए हैं कि वे 13 प्रतिशत रोकथाम वाले उम्मीदवारों की सूची और मेरिट रैंकिंग सार्वजनिक करें और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता बरतें। साथ ही, कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी उम्मीदवार से कम मेरिट वाले को नियुक्ति मिली है तो उसके बारे में भी स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए। कोर्ट किस दिशा में निर्णय देगा, यह इस विवाद के अंतिम समाधान का मार्ग प्रशस्त करेगा।