सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में रियल एस्टेट सेक्टर की गड़बड़ियों और मुनाफाखोर निवेशकों की गतिविधियों पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि मकान केवल एक संपत्ति नहीं, बल्कि जीवन का मूलभूत अधिकार है। इस फैसले में कोर्ट ने निवेश के उद्देश्य से फ्लैट खरीदने वाले और बिल्डरों के बीच की साठगांठ पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं, जिससे खरीदारों का फंड सुरक्षित रहे और योजनाएं समय पर पूरी हों। यह फैसला मध्यवर्गीय खरीदारों के हितों की रक्षा के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
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आवास को जीवन का मूल अधिकार बताया
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आवास को जीवन का मूलभूत अधिकार घोषित किया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब करोड़ों मध्यवर्गीय परिवार कोई भी अतिरिक्त स्थिरता चाहते हैं। कोर्ट ने कहा कि घर सिर्फ छत नहीं बल्कि जीवन की आशाएं हैं, इसलिए इसे सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट समझकर टाला नहीं जाना चाहिए। कई लोग अपनी पूरी जीवन भर की बचत ऐसी संपत्तियों में निवेश कर देते हैं।
घरों के लिए विशेष पुनरुद्धार कोष बनाने का प्रस्ताव
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को प्रतिनिधि समिति बनाकर एक पुनरुद्धार कोष (revival fund) बनाने का सुझाव दिया है, जो अधूरे पड़े या संकटग्रस्त रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स की मदद करेगा। इस कोष से ऐसे प्रोजेक्ट्स को पूरा करके खरीदारों को उनके घर दिलाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, कोर्ट ने स्वामिह फंड (SWAMIH) को बढ़ाने या नेशनल एसेट रिस्ट्रक्चरिंग कंपनी लिमिटेड (NARCL) जैसी विशेष संस्था बनाने की भी सिफारिश की है, जो संकटग्रस्त प्रोजेक्ट्स की देखरेख करेगी।



