नई व्यापार नीति के तहत अमेरिकी सरकार द्वारा माल पर टैरिफ बढ़ाने का फैसला आते ही कई कंपनियों ने अपने खरीदारों को ईमेल के जरिये अपनी रणनीति की जानकारी देना शुरू कर दी है। कंपनियों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब उनकी लागत बढ़ गई है और वे यह बदलाव माल की कीमतों में एडजस्ट करने जा रही हैं। इस फैसले ने बाजार में संचार और पारदर्शिता के नए मानक स्थापित किए हैं, जिससे ग्राहक भी स्थिति की गंभीरता समझ पा रहे हैं।
अमेरिकी खरीदारों की सख्ती
अमेरिकी खरीदारों ने कंपनियों को स्पष्ट संदेश दिया है—अगर टैरिफ से बढ़ी लागत माल की कीमत में समायोजित नहीं की जाती तो वे नए सप्लाई ऑर्डर नहीं लेंगे। इससे कंपनियों पर दबाव बढ़ गया है कि वे अपनी मूल्य-नीति को त्वरित और प्रभावी रूप से बदलें। खरीदारों की यह मांग खासकर उन उत्पादों पर अधिक है, जिनकी शेल्फ लाइफ कम है या जिनमें प्रतिस्पर्धी देशों का विकल्प उपलब्ध है।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर असर
नये टैरिफ न सिर्फ कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि पूरी आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर रहे हैं। ऑटो, परिधान और खाद्य वस्तुओं जैसे सेक्टर्स में लागत बढ़ने के साथ डिलिवरी भी प्रभावित हो रही है। कंपनियां रणनीति बदलने, वैकल्पिक स्रोत ढूंढने और कीमत समायोजित करने की कोशिश कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कंपनियां खरीदारों की मांगों को नहीं मानतीं तो ऑर्डर कम हो सकते हैं, जिससे लगातार सप्लाई बनाए रखना बड़ी चुनौती बन सकता है।
भारत के निर्यातकों पर दबाव
अमेरिकी खरीदारों की मांग से भारत के निर्यातकों के लिए भी स्थिति चुनौतीपूर्ण हो गई है। टैरिफ के कारण भारतीय माल की कीमत 13% तक बढ़ सकती है, जिससे कम मार्जिन वाले वस्त्र, मत्स्य और कृषि उत्पादों का निर्यात खतरे में पड़ सकता है। भारतीय निर्यातक सरकार से अतिरिक्त राहत, सस्ता कर्ज और एक्सपोर्ट क्रेडिट इंश्योरेंस की मांग कर रहे हैं ताकि अमेरिकी बाजार में अपना स्थान बनाए रखा जा सके।
बाजार में प्रतिस्पर्धा की हलचल
टैरिफ के दबाव में अमेरिकी बाजार में भारत की हिस्सेदारी कमजोर हो रही है। इसी बीच केन्या, जापान, दक्षिण कोरिया, टर्की व इक्वाडोर जैसे देश जो अब तक मुख्य प्रतिस्पर्धी नहीं थे, वे अमेरिकी खरीदारों को सस्ती दरों पर सप्लाई देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इससे भारतीय कंपनियों के सामने अपने ग्राहकों को बनाए रखने की एक बड़ी चुनौती पैदा हो गई है।