झारखंड की सियासत में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और जनजातीय राजनीति के कद्दावर नेता शिबू सोरेन का दिल्ली के एक अस्पताल में निधन हो गया। इसी बीच विपक्षी दलों ने 8 अगस्त को चुनाव आयोग तक मार्च निकालने की घोषणा की थी, जिसे अब बदलकर 11 अगस्त कर दिया गया है। इस बदलाव के पीछे शिबू सोरेन के निधन का गहरा असर माना जा रहा है, जिसमें सभी प्रमुख दलों का स्नेह और सम्मान झलकता है।
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झारखंड के ‘दिशोम गुरु’ को अंतिम विदाई
शिबू सोरेन को झारखंड में ‘दिशोम गुरु’ यानी जनजातीय समुदाय का मसीहा कहा जाता था। उनके निधन के बाद राज्य सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित तमाम राजनीतिक हस्तियों ने उनके पार्थिव शरीर को श्रद्धांजलि दी। अंतिम संस्कार के कार्यक्रम में आदिवासी संस्कृति और जनसंख्या का बड़ा जमावड़ा दिखा, और झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र स्थगित कर दिया गया।
लोकतंत्र में प्रतिरोध: चुनाव आयोग तक मार्च
झारखंड सहित देशभर के विपक्षी दलों ने 8 अगस्त को चुनाव आयोग तक मार्च की घोषणा की थी। इसका मकसद बिहार और झारखंड समेत विभिन्न राज्यों में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर आपत्ति जताना था। विपक्ष का मानना है कि इस निर्वाचन प्रक्रिया में धांधली की आशंका है और इससे कमजोर वर्गों तथा अल्पसंख्यकों के मताधिकार पर संकट आ सकता है।http://AI language evolution- AI के गॉड फादर ने दी चेतावनी, चैटबॉट ने अपनी भाषा बना ली तो रोकना मुस्किल?
शिबू सोरेन की विरासत और विपक्ष की एकजुटता
शिबू सोरेन का जाना झारखंड और पूरे भारत के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने जिन मूल्यों—आदिवासी अधिकार, क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक न्याय—को राजनीति का केन्द्रीय विषय बनाया, उनकी झलक मौजूदा विपक्षी एकता में भी दिखती है। विपक्षी दलों ने कार्यक्रम स्थगित कर, उनके प्रति सम्मान और श्रद्धांजलि अर्पित की है।
राजनीतिक रणनीति: SIR पर घेराबंदी
विपक्षी नेता लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ के नाम पर बीजेपी शासित केंद्र सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं के दुरुपयोग से गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यक मतदाताओं का नाम हटवाने की साजिश कर रही है। झारखंड मुक्ति मोर्चा और झारखंड कांग्रेस ने इसे संविधान मूल्यों पर सीधा हमला बताया है और विधानसभा में इसके खिलाफ प्रस्ताव लाने की घोषणा की है।